यह प्रश्न केवल एक वक्तव्य का नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता, जिम्मेदारी और राष्ट्रीय हित की समझ का है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर सार्वजनिक वक्तव्यों में संवेदनशीलता अनिवार्य होती है। सीमाओं से जुड़े तथ्य, सैन्य तैनाती, रणनीतिक आकलन-ये सब ऐसे विषय हैं जिन पर आधे-अधूरे संदर्भ या चयनित उद्धरण अनावश्यक भ्रम पैदा कर सकते हैं। हालिया घटनाक्रम में लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के कुछ अंशों का हवाला देकर चीनी सेना की कथित घुसपैठ को लेकर जो बयान दिया गया, उसने इसी अपेक्षा पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। सरकार का आरोप रहा कि इस बयान ने लोकसभा को गुमराह करने का प्रयास किया। राहुल गांधी केवल कांग्रेस के नेता ही नहीं, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। कम से कम राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में तो उन्हें भारतीय सेनाओं के नैरेटिव के साथ खड़े होना चाहिए। दुर्भाग्य से वे ऐसा नहीं करते। वे चीन और पाकिस्तान को लेकर यह स्वीकार नहीं करते कि इन दोनों देशों ने भारतीय भूभाग पर तब अतिक्रमण किया, जब कांग्रेस सत्ता में थी।





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